दीपक 'कुल्लुवी' की कलम से.................

मेरे गम से न रख रिश्ता मगर अपना मुझे दे दे, अपने दर्द के लम्हे हमारे नाम तू कर दे ,हम इतने भी नहीं बुजदिल जो डर जाएँगे इतने में, न हो हमपे यकीं ऐ-दोस्त तो मेरी जान भी ले ले

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अंतिम क्षण

Posted On: 20 Jul, 2012 में

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अंतिम क्षण

अंतिम क्षण मेरे जीवन के
कितने सुहाने होंगे
कोई न होगा साथ हमारे
हम तन्हा ही होंगे
ऐसा नहीं हम इस दुनियां को
छोड़ के चल देंगे
बज़ूद हमारा मिट नहीं सकता
यहीं कहीं पे रहेंगे
राख़ को मेरी बहा नहीं सकते
चिता पे मुझको जला नहीं सकते
सौंप दिया है जिस्म-ओ-जाँ हमने
चाहकर भी दफना नहीं सकते
अपनें हो य बेगाने
सबको ही याद आऊंगा
आप चाहो न चाहो आपके
दिल में बस जाऊंगा
दिल में बस जा —-
——–
इस कविता की सत्यता यह है की मैंने अपनी मौत के बाद अपना मृत शरीर एम्स (ऑल इण्डिया इंस्टिट्यूट ऑफ मैडिकल साइंसिस) को दान दे दिया है I तो कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में तो रहूँगा ही I जो मेरे अपनों मेरे चाहने वालों को यह एहसास दिलाता रहेगा की मेरा बज़ूद इस जमीं पर है और रहेगा I
दूसरा बरसों पहले मैंने एक कविता लिखी थी ‘मेरी राख़ को दुनियां वालो गंगा में न बहाना,प्रदूषित हो चुकी बहुत और उसे न बढ़ाना ‘ यह साधना टी0 व़ी0 चैनल के लोकप्रिय प्रोग्राम ‘कवियों की चौपाल’ में भी प्रसारित हुई थी और ‘जर्नलिस्ट टुडे नेटवर्क’ पर यह मेरी पहली कविता छपी थी I इसपर कई लोगों,आलोचकों नें उंगली उठाई थी,उनका कहना था  की थी कि डायलॉग तो सारे ही मार लेते हैं कोई करके तो दिखाए I अब कोई यह नहीं कह सकता की कवि झूठ लिखते हैं I

दीपक शर्मा कुल्लुवी

9350078399

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepaksharmakuluvi के द्वारा
July 21, 2012

thx

phoolsingh के द्वारा
July 21, 2012

भावना पूर्ण रचना के साथ साथ सुध विचारो का समावेश जो कोई आसानी से नहीं कर पाता. फूल सिंह


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