दीपक 'कुल्लुवी' की कलम से.................

मेरे गम से न रख रिश्ता मगर अपना मुझे दे दे, अपने दर्द के लम्हे हमारे नाम तू कर दे ,हम इतने भी नहीं बुजदिल जो डर जाएँगे इतने में, न हो हमपे यकीं ऐ-दोस्त तो मेरी जान भी ले ले

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जीने का हुनर

Posted On: 31 Aug, 2012 Others में

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जीने का हुनर

हम  मुहब्बत के पुजारी हैं इश्क करते हैं

ग़म के सहरा पे चलनें का  दम भरते  है
दर्द का रिश्ता तो इस दिल पुराना है दोस्त
हम तो तन्हाई में जीने का हुनर रखते हैं

दीपक ‘कुल्लुवी’
31 अगस्त 2012
جینے کا ہنر
ہم محبّت کے پجاری ہیں عشق کرتے ہیں
گم کے سہرا پی چلنیں کا دم بھرتے ہیں
درد کا رشتہ تو اس دل سے پرانا ہے دوست
ہم تو تنہائی میں جینے کا ہنر رکھتے ہیں

دیپک کلّوی

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

deepaksharmakuluvi के द्वारा
August 31, 2012

खुश्वाहा जी सब आप जैसे दोस्त मित्रों की मेहरवानी और कुछ बेवफाओं के ग़म है जो लिखते ही रहते है धन्यबाद दीपक ‘कुल्लुवी’ 31 अगस्त 2012

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
August 31, 2012

छोटी सी है दुनिया पहचाने रास्ते हैं हम हर जगह मिलते हैं कहाँ तक तारीफ़ करून आपकी आप इतना सुन्दर और बहुत लिखते है. बसी रहती है yaad हमेशा दिल में अभी सलाम नमस्ते फिर मिलते हैं. बधाई , सादर अभिवादन के साथ सर जी.


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