दीपक 'कुल्लुवी' की कलम से.................

मेरे गम से न रख रिश्ता मगर अपना मुझे दे दे, अपने दर्द के लम्हे हमारे नाम तू कर दे ,हम इतने भी नहीं बुजदिल जो डर जाएँगे इतने में, न हो हमपे यकीं ऐ-दोस्त तो मेरी जान भी ले ले

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कितना बदल गया

Posted On: 10 Sep, 2012 Others में

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कितना बदल गया

मेरा शहर कितना बदल गया
मेरे वास्ते अब क्या रहा
मेरा शहर कितना बदल —–
न वोह मंजिलें न वोह रास्ते
जो कभी थे मेरे वास्ते
यहाँ लुट गया मेरा आशियाँ
यहाँ  हमसफ़र न कोई रहा
मेरा शहर कितना बदल —–
जो गुजर गया उसे भूल जा
मेरा दिल यह कहता है मान  जा
यह वक़्त की सौगात  है
मेरा वक़्त अच्छा ना रहा
मेरा शहर कितना बदल —–
अब तो अजनवी सा लगे शहर
रिश्तों में घुल चुका ज़हर
कहने को सब अपनें हैं
अपनापन अब कहाँ रहा
मेरा शहर कितना बदल —–
किस किस को समझाओगे तुम
‘दीपक’ बड़ा मासूम है
टुकड़े भी दिल के वंट गए
मेरा दिल भी मेरा कहाँ रहा
मेरा शहर कितना बदल —–
दीपक शर्मा कुल्लुवी

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
September 12, 2012

किस किस को समझाओगे तुम ‘दीपक’ बड़ा मासूम है टुकड़े भी दिल के वंट गए मेरा दिल भी मेरा कहाँ रहा मेरा शहर कितना बदल —– बहुत खूब ! सुन्दर व्यथा के शब्द कुल्लावी साब

    deepaksharmakuluvi के द्वारा
    September 12, 2012

    shukriya janav for liking my ghazal

deepaksharmakuluvi के द्वारा
September 12, 2012

THANKS


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