दीपक 'कुल्लुवी' की कलम से.................

मेरे गम से न रख रिश्ता मगर अपना मुझे दे दे, अपने दर्द के लम्हे हमारे नाम तू कर दे ,हम इतने भी नहीं बुजदिल जो डर जाएँगे इतने में, न हो हमपे यकीं ऐ-दोस्त तो मेरी जान भी ले ले

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चाहते क्या हो..?

Posted On: 3 Nov, 2012 Others में

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चाहते क्या हो..?

डी0 टी0 सी0 भर भर के चलती

फिर भी क्यों  होता घाटा
इतना पैसा जाता कहाँ
हरगिज़ समझ न आता
क्या चाहती है डी०टी०सी०
क्या चाहती सरकार
छत पे बैठकर सफ़र करें
क्या तभी होगा उद्धार
खड़ी बस के ए०सी० बंद रखो
टिकेट चैकर कम करो
जितनें के चालान वह काटते होंगे
उससे अधिक ही होगी पगार
जिन रूटों पे अधिक स्वारी
वहां पे बसें अधिक चलाओ
और जहाँ पे कम है स्वारी
वहां अधिक की क्या दरकार

दीपक कुल्लुवी
09350078399
03 /11 /12.

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

phoolsingh के द्वारा
November 3, 2012

शर्मा जी नमस्कार बहुत ही स्टिक और सुंदर व्यंग ……..बधाई स्वीकारे… फूल सिंह


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